प्रेम… एक ऐसा भाव जो न उम्र देखता है, न जात-पात, न समय का बंधन। कभी अचानक किसी मोड़ पर मिल जाता है, तो कभी वर्षों के इंतज़ार के बाद भी अधूरा रह जाता है। ऐसी ही एक सच्चे प्रेम की कहानी है—आरव और सिया की।लखनऊ की पतली गलियों में बसी थी एक पुरानी कोठी, जहाँ आरव अपने माता-पिता के साथ रहता था। कॉलेज की पढ़ाई कर चुका था और अब घर की किताबों की दुकान में अपने पिता का हाथ बंटाता था। आरव शांत स्वभाव का, गहराइयों में डूबा हुआ लड़का था, जो कविताएं लिखता और चुपचाप ग्राहकों को किताबें देता। उसी मोहल्ले में कुछ महीनों पहले सिया अपने परिवार के साथ आई थी। वह दिल्ली से आई थी और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी। हँसमुख, तेज़, और ज़िंदादिल सिया, जब पहली बार किताब खरीदने आई, तो आरव उसे देखकर चौंक गया। उसकी आँखों में एक चमक थी, और मुस्कान में जादू। “क्या आपके पास गुलज़ार की कविताएं हैं?” सिया ने पूछा।आरव ने धीरे से एक किताब बढ़ा दी, “यह मेरी पसंदीदा है।”

उस दिन के बाद सिया अक्सर आने लगी। कभी किताब खरीदने, कभी पढ़ाई का बहाना बनाकर, कभी यूँ ही बात करने। आरव पहले झिझकता रहा, लेकिन धीरे-धीरे वह सिया की बातों में खोने लगा। दोनों को किताबों का शौक था, और इसी शौक ने दोनों को करीब ला दिया।एक शाम आरव ने सिया को अपने लिखे हुए कुछ शेर सुनाए। सिया की आँखें भर आईं। “तुम्हारी लिखावट में एहसास है, जैसे किसी पुराने खत की महक।” वो शाम बहुत खास थी। पहली बार आरव ने महसूस किया कि शायद यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। और शायद सिया भी कुछ महसूस कर रही थी पर आरव कह नहीं सका। उसके अंदर डर था—खो देने का, ठुकराए जाने का। उसने उस भावना को कविताओं में दबा दिया। कुछ महीनों बाद सिया को दिल्ली लौटना पड़ा। उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, और अब उसे एक जानी-मानी न्यूज़ एजेंसी में नौकरी मिल गई थी। विदा की उस शाम आरव और सिया घंटों बैठे रहे। चाय के कप सामने रखे थे, लेकिन दोनों ने एक घूंट भी नहीं पिया। “शायद अब हम कम मिल पाएंगे,” सिया ने कहा। आरव कुछ नहीं बोला। उसके भीतर सब कुछ टूट रहा था, लेकिन शब्द नहीं निकले।सिया उठी, मुस्कुराई और कहा, “अगर कभी मेरी याद आए, तो वो गुलज़ार वाली किताब खोल लेना। उसमें मेरा एक खत रखा है।” आरव ने चौंककर देखा, लेकिन तब तक सिया जा चुकी थी। आरव ने रात को वो किताब खोली। उसमें एक कागज़ रखा था। खत में लिखा था:
आरव,
जब पहली बार तुम्हें देखा, तब लगा कि जैसे कोई कविता मेरे सामने खड़ी है। तुम्हारे शब्दों में जो खामोशी है, वो बहुत कुछ कहती है। मैं नहीं जानती ये क्या है, लेकिन तुम्हारे बिना लखनऊ की गलियाँ अधूरी लगेंगी। मैं चाहती हूँ कि एक दिन तुम अपनी बात कहो… बिना डर के। मैं इंतज़ार करूँगी।
— तुम्हारी सिया

आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े। पर अब बहुत देर हो चुकी थी। वो सिया को कॉल नहीं कर सका, न ही कभी खत भेज पाया। पाँच साल बीत गए। आरव अब एक प्रसिद्ध लेखक बन चुका था। उसकी किताबें बिकने लगी थीं, और उसका पहला कविता-संग्रह ‘वो गुलज़ार की किताब’ बेस्टसेलर बना। एक दिन लखनऊ में एक साहित्य सम्मेलन हुआ। मंच पर आरव को बुलाया गया। उसने वही कविता पढ़ी जो उसने कभी सिया को सुनाई थी। पीछे की पंक्ति में एक महिला बैठी थी—बाल खुले, आँखों में चमक, हाथों में वही गुलज़ार की किताब। आरव की नजरें उससे मिलीं, और वह ठहर गया। सिया… भीड़ से हटते हुए वह मंच के पास आई। दोनों की आंखों में शब्दों से ज्यादा भाव थे। “मैं अब भी इंतज़ार कर रही थी,” सिया ने धीरे से कहा। आरव ने उसका हाथ थामा और मुस्कुरा कर बोला- “अब मैं बोलने से नहीं डरता… मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, सिया। हमेशा से………….” कभी-कभी प्रेम को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जाता, वो बस आंखों में रहता है, इंतज़ार में जीता है, और फिर वक्त आने पर खुद-ब-खुद पूरी कविता बन जाता है। आरव और सिया की प्रेम कहानी इस बात का प्रतीक है कि सच्चा प्यार लौटकर ज़रूर आता है—चाहे वर्षों लग जाएं, लेकिन वो अधूरा नहीं रहता।